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मैं टूट रहा हूं, मगर

कितना कुछ कहना चाहता हूं,
कोशिश भी की,
तुम्हे लिखने की, आज सुबह
मगर शब्द कही खो गए है,
कहा से शुरुआत करू,
मुझे मालूम नहीं।

कोशिश कर रहा हूं,
की कुछ बिना कहे ही
कुछ कह पाऊं,
महर शब्द बिना कैसे कहूं।

शायद मैंने कभी,
सीखा ही नहीं,
ईश्क करना, और मोहब्बत
तो शायद मेरे शब्दों
में ही खो गई।

सोचा था, कुछ होगा,
मगर ऐसा होगा, यह तुमने कहा
सोचा था और मैंने भी कहा सोचा था।

तुम्हे इतना दर्द दिया, और तुमने मुझे,
क्यों? शायद यही दुनिया का दस्तूर है।

अब भी सोच रहा हूं,
तुम्हारे बारे में, मगर शब्द तो
खो से गए है।

दर्द जो है बहता जा रहा है,
झेलम की तरह, हाथ रख लिए है
जख्म पर, मगर यह जख्म इतनी
जल्दी कहा भरने वाले है।

क्या तुम्हे भी दर्द हो रहा है?
या तुमने मुझे भुला दिया है,
मेरा यह प्यार भी कैसा प्यार है,
जिससे तुम्हारी हर सांस पर दम निकले

और तुम्हारा भी यह कैसा प्यार है,
जो कभी बयान ही ना हो पाए और
उनसे…

बस खूब लिख लिया,
आज के लिए, अब यह
सासें भी थक गई है।

मैं टूट रहा हूं, मगर
फिर खिलूंगा, फिर बहूंगा।

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